फार्मास्यूटिकल्स विभाग ने 12 अक्टूबर, 2026 को दायर हलफनामे में सुप्रीम कोर्ट को बताया कि कैंसर उपचार से इतर दवाओं के मार्जिन की भी सरकार समीक्षा कर रही है। सरकार ने कैंसर-रोधी दवाओं पर व्यापार मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य के 30% तक सीमित करने का फैसला किया है, लेकिन उसने अतिरिक्त श्रेणियों या आगे की कार्रवाई के लिए समय-सीमा की घोषणा नहीं की है।
मुख्य बातें
- सरकार संबंधित पक्षों से परामर्श करके अन्य ऊंचे मार्जिन और मूल्य निर्धारण की प्रथाओं की जांच कर रही है।
- सरकार को उम्मीद है कि कैंसर-दवा पर लगाई गई सीमा से अधिकतम खुदरा कीमतें लगभग 20% से 70% तक घटेंगी और मरीजों को सालाना करीब ₹2,500 करोड़ की बचत होगी।
- सरकार ने कहा कि अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य वस्तुओं पर एक समान प्रतिशत मार्जिन लागू नहीं होगा, क्योंकि उत्पादों और अस्पतालों की बिलिंग प्रथाओं में अंतर है।
भारत में दवाओं के मार्जिन की जांच क्यों हो रही है
यह हलफनामा डॉ. संजय कुलश्रेष्ठ द्वारा दायर याचिका के जवाब में दाखिल किया गया। विभाग ने कहा कि मरीजों के पास अस्पतालों, डॉक्टरों और फार्मेसियों की तुलना में कम जानकारी और मोलभाव करने की कम शक्ति होती है। इससे दवा निर्माताओं के बीच प्रतिस्पर्धा होने के बावजूद अनुचित गतिविधियों की गुंजाइश बनती है।
सरकार ने कहा कि अस्पताल उन निर्माताओं से दवाएं खरीदते हैं जो सबसे अधिक व्यापार मार्जिन देते हैं और उन्हें मरीजों को अधिकतम खुदरा मूल्य, यानी MRP, पर बेचते हैं। उसने कहा कि ऑन्कोलॉजी में मार्जिन 170% से 700% या उससे अधिक है, जबकि अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य वस्तुओं पर मार्जिन आम तौर पर 100% से 1,000% या उससे अधिक होता है।
हलफनामे के अनुसार, सरकारी योजनाओं और बीमा के तहत आपूर्तियों को बातचीत से तय पैकेज दरों में शामिल किया जाता है, जबकि सीधे भुगतान करने वाले मरीजों से अलग से MRP के हिसाब से बिल लिया जाता है।
कैंसर-दवाओं पर सीमा और अनुमानित बचत
सरकार ने कहा कि 30% की सीमा का उद्देश्य उचित मार्जिन बनाए रखते हुए अत्यधिक व्यापार मार्जिन को रोकना है। इससे निर्माताओं के विक्रय मूल्य सीधे तौर पर कम नहीं हो रहे हैं। कीमतों में अनुमानित कमी और सालाना बचत अनुमान हैं, वास्तविक परिणाम नहीं।
2019 की एक अधिसूचना में अनुसूचित सूची से बाहर की 42 कैंसर-रोधी दवाओं के मार्जिन पर सीमा तय की गई थी। हलफनामे के अनुसार, इस कवायद से 526 ब्रांडों के MRP घटे और सालाना करीब ₹984 करोड़ की बचत हुई।
व्यापक सीमाओं के लिए परामर्श क्यों जरूरी है
सरकार ने कहा कि कुछ उत्पादों पर ऊंचे मार्जिन उचित हो सकते हैं, जिनमें कम मूल्य वाली या धीमी गति से बिकने वाली दवाएं, ग्रामीण बाजारों में बेची जाने वाली दवाएं और कोल्ड-चेन भंडारण या नाजुक पैकेजिंग की जरूरत वाले उत्पाद शामिल हैं।
हलफनामे के अनुसार, अस्पताल में इस्तेमाल होने वाली उपभोग्य वस्तुओं की कीमत बेहद सस्ती चीजों से लेकर ₹350 या उससे अधिक कीमत वाले उत्पादों तक होती है, जबकि नर्सिंग और प्रशासनिक बिलिंग अस्पताल के अनुसार अलग-अलग होती है। इन भिन्नताओं के चलते मार्जिन तय करने के लिए व्यापक परामर्श जरूरी है।
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