इज़राइली लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड ने कहा कि 27 अक्टूबर, 2026 को होने वाले इज़राइल के चुनाव में कोई भी जीते, भारत-इज़राइल संबंध मजबूत बने रहने की संभावना है। उन्होंने रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच संबंधों को इस साझेदारी का आधार बताया।

मुख्य निष्कर्ष

  • पोलार्ड को उम्मीद है कि चुनाव के नतीजे चाहे जो हों, दोनों देशों के बीच संबंध करीबी बने रहेंगे।
  • किसी नए इज़राइली नेता और मोदी के बीच तालमेल से इस संबंध को एक नया आयाम मिल सकता है।

भारत-इज़राइल संबंध करीबी क्यों बने रह सकते हैं

पोलार्ड ने कहा कि इज़राइल भारत के साथ अपने संबंधों को बहुत महत्व देता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि इज़राइल के नेतृत्व में बदलाव से संबंधों की गतिशीलता बदल सकती है, जो कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नया प्रधानमंत्री मोदी के साथ तालमेल स्थापित कर पाता है या नहीं।

यह आकलन मतदान से पहले पोलार्ड की राय है, न कि किसी भी सरकार की प्रतिबद्धता।

चुनाव में सुरक्षा और अनिवार्य सैन्य सेवा से जुड़े मुद्दे

पोलार्ड ने 7 अक्टूबर के हमास हमले को चुनाव का एक प्रमुख मुद्दा बताया। उन्होंने कहा कि कई इज़राइली नेतन्याहू को उस घटना के लिए जिम्मेदार मानते हैं, जिसे व्यापक रूप से सुरक्षा और खुफिया तंत्र की विफलता के रूप में देखा गया। उन्होंने अति-रूढ़िवादी यहूदियों को सैन्य सेवा से छूट देने की आलोचना का भी उल्लेख किया, जबकि रिज़र्व सैनिकों को बार-बार तैनाती का सामना करना पड़ रहा है।

अन्य मुद्दों में हमले की जांच के लिए राष्ट्रीय जांच आयोग गठित करने पर अनसुलझी बहस और नेतन्याहू के प्रस्तावित न्यायिक सुधार शामिल हैं। पोलार्ड ने कहा कि विपक्ष का तर्क है कि प्रधानमंत्री के अति-दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगियों ने इज़राइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करने में योगदान दिया है।

पोलार्ड ने यह भी कहा कि उन्हें चुनाव के नतीजे से गाज़ा नीति में बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है।

अगला अहम पड़ाव

इज़राइल का चुनाव 27 अक्टूबर, 2026 को निर्धारित है।

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