23 अक्टूबर, 2026 को भारत में बॉन्ड यील्ड बढ़ी, क्योंकि सरकारी प्रतिभूतियों में लगातार 10वें सप्ताह नुकसान दर्ज हुआ। यह तीन दशकों में उनकी सबसे लंबी गिरावट की अवधि है। ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब रहने और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की ओर से आगे और सख्ती की उम्मीदों ने बाजार पर दबाव बनाए रखा।
मुख्य बातें
- बेंचमार्क 2036 बॉन्ड की यील्ड 7.4740% पर बंद हुई, जो सप्ताह के दौरान नौ आधार अंक बढ़ी।
- आयातित तेल पर भारत की भारी निर्भरता के कारण ऊंची कच्चे तेल की कीमतों से मुद्रास्फीति और सार्वजनिक वित्त पर जोखिम बना हुआ है।
- ICICI Securities Primary Dealership को उम्मीद है कि फरवरी 2027 तक रेपो दर 6% पर पहुंच जाएगी; यह पूर्वानुमान है, RBI की प्रतिबद्धता नहीं।
विषय-सूची
- भारत में बॉन्ड यील्ड में लंबी अवधि की बढ़त जारी
- 115 डॉलर के करीब तेल से मुद्रास्फीति की चिंताएं बढ़ीं
- RBI की आगे की सख्ती अभी भी पूर्वानुमान
- निष्कर्ष
भारत में बॉन्ड यील्ड में लंबी अवधि की बढ़त जारी
2036 में परिपक्व होने वाले 6.94% सरकारी बॉन्ड की यील्ड शुक्रवार को 7.4740% पर बंद हुई, जबकि पिछले सत्र में यह 7.4596% थी। बॉन्ड की कीमतें यील्ड के विपरीत दिशा में चलती हैं, इसलिए यील्ड में बढ़ोतरी का मतलब इस प्रतिभूति की कीमत में एक और गिरावट था।
सप्ताह के दौरान नौ आधार अंकों की बढ़ोतरी से पहले के नौ सप्ताह में कुल 62 आधार अंकों की वृद्धि हुई थी। 1998 के बाद इतनी अवधि में यह सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी। इस तरह नवीनतम सप्ताह ने पहले से ही काफी बड़े पुनर्मूल्यांकन को आगे बढ़ाया, न कि किसी अलग-थलग बिकवाली को दर्शाया।
| मद | विवरण |
|---|---|
| एक-वर्षीय ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप | 6.58% |
| दो-वर्षीय ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप | 6.65% |
| पांच-वर्षीय ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप | 6.8150% |
115 डॉलर के करीब तेल से मुद्रास्फीति की चिंताएं बढ़ीं
ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल पर बनी हुई थी, जो करीब छह महीनों का उच्चतम स्तर है। बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में और व्यवधान की चिंताएं बढ़ा दीं।
भारत अपनी तेल जरूरतों का करीब 90% आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी के विशेष रूप से गंभीर नतीजे हो सकते हैं। तेल की ऊंची लागत से आयात बिल बढ़ता है, मुद्रा और मुद्रास्फीति के परिदृश्य पर दबाव पड़ता है तथा सार्वजनिक वित्त कमजोर होता है। इन जोखिमों के बीच निवेशक आकलन कर रहे हैं कि ब्याज दरें और कितनी बढ़ सकती हैं, जिससे सरकारी बॉन्ड के लिए स्थितियां जटिल हो रही हैं।
RBI की आगे की सख्ती अभी भी पूर्वानुमान
अक्टूबर की शुरुआत में RBI ने अपनी बेंचमार्क रेपो दर बढ़ाकर 5.5% कर दी और नीतिगत रुख को क्रमिक सख्ती की ओर मोड़ा। इससे संकेत मिला कि यदि कीमतों का दबाव और स्थायी होता है, तो वह दरें और बढ़ाने के लिए तैयार है।
भारतीय आर्थिक सेवा की रेपो दर की व्याख्या के अनुसार, यह वह निश्चित दर है जिस पर RBI सरकारी प्रतिभूतियों के बदले बैंकों को रातोंरात ऋण देता है। इस दर में बदलाव मुद्रा बाजारों के माध्यम से अन्य ब्याज दरों तक पहुंचता है और मांग, मुद्रास्फीति तथा वृद्धि को प्रभावित करता है।
ICICI Securities Primary Dealership ने कहा कि बैठक के कार्यवृत्त और व्यापक आर्थिक परिदृश्य से फरवरी 2027 तक नीतिगत दर 6% पर पहुंचने का संकेत मिलता है। उसके अनुसार, दिसंबर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी लगभग निश्चित है, जबकि आने वाले आंकड़ों और वैश्विक घटनाक्रमों के आधार पर 50 आधार अंकों की बड़ी बढ़ोतरी सामरिक रूप से उचित हो सकती है। इनमें से कोई भी परिणाम RBI का घोषित निर्णय नहीं है।
सरकारी बॉन्ड यील्ड के विपरीत, ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप दरों में सप्ताह के दौरान मोटे तौर पर कोई बदलाव नहीं हुआ। शुक्रवार को उनके बंद स्तर थे:
निष्कर्ष
10 सप्ताह की बिकवाली के बाद भारत की बॉन्ड यील्ड तेल की कीमतों और RBI के अगले नीतिगत फैसले के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। दिसंबर का फैसला आगे की सख्ती की उम्मीदों की परीक्षा लेगा; बढ़ोतरी का आकार अभी तय नहीं है।
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